Research; एसएनएमसी के डॉक्टर्स ने कोरोना काल में ब्लैक फंगस के मरीजों पर एक साल तक रिसर्च किया था. जिसमें सामने आया था कि म्यूकोर्माइकोसिस की सबसे बड़ी वजह हाई ब्लड शुगर था. ये रिसर्च नेशनल लाइब्रेरी आफ मेडिसिन (पबमेड) में प्रकाशित हुई है.
आगरा, उत्तर प्रदेश.
Research; कोरोना (COVID-19) यानी ऐसी बीमारी जिसमें अपनों ने भी दूरी बना ली थी. कोरोना संक्रमण की दूसरी लहर के बाद 2021 में फैले जानलेवा ब्लैक फंगस (Black Fungus) को भला कौन भूल सकता है. ब्लैक फंगस के कारण देशभर में तमाम लोगों की जान चली गई. कइयों ने आंखें और जबड़े खोए. आगरा के एसएन मेडिकल कॉलेज (SN Medical College, Agra) की रिसर्च (Research) में खुलासा हुआ है कि ब्लैक फंगस के अधिकतर शिकार मरीज की बात करें तो वे थे, जिन्होंने कोविड वैक्सीन (COVID vaccine) की डोज नहीं लगवाई थी.
बता दें कि आगरा के एसएन मेडिकल कालेज के डॉक्टर्स ने कोरोना काल में लोगों की जानें बचाईं थी. कोरोना की दूसरी लहर के दौरान देश में फैले म्यूकोमाइकोसिस यानी ब्लैक फंगस ने कहर बरपाया तो एसएन मेडिकल कॉलेज के डॉक्टर्स ने ब्लैक फंगस के मरीजों का उपचार किया. जिससे उनकी जान बची और आंख समेत अन्य अंग भी बचे. इसके साथ ही एसएन मेडिकल कॉलेज के डॉक्टर्स ने ब्लैक फंगस से पीड़ितों पर एक साल तक अध्ययन किया. इस रिसर्च में 97 मरीज शामिल किए गए. रिसर्च में चौंकाने वाली जानकारी सामने आई है. रिसर्च में 91.8 फीसदी मरीज रहें. जिन्होंने कोविड की वैक्सीन नहीं लगवाई थी.
वैक्सीन लगवाने से ब्लैक फंगस का खतरा कम था
एसएन मेडिकल कॉलेज की रिसर्च में खुलासा हुआ है कि ब्लैक फंगस के कुछ मरीजों ने एक या दो डोज की वैक्सीन की जरूर लगवाई थी. इससे रिसर्चर का दावा है कि कोरोना की वैक्सीन लगवाने से ब्लैक फंगस का खतरा कम हो सकता है. ब्लैक फंगस का सीधा संबंध डायबिटीज से देखा गया था. रिसर्च में 56.7 फीसदी मरीज पहले से डायबिटीज के मरीज थे और दवाइयां खा रहे थे. इन मरीजों का शुगर स्तर 112 से लेकर 494 एमजी डीएल पाया गया था.
Research टीम में ये डॉक्टर्स रहे शामिल
एसएन मेडिकल कॉलेज की ब्लैक फंगस को लेकर की गई रिसर्च में मेडिसिन विभाग के प्रोफेसर डॉ. प्रभात अग्रवाल, डॉ. आशीष गौतम, ईएनटी विशेषज्ञ डॉ. अखिल प्रताप सिंह, डॉ. धर्मेंद्र कुमार, प्लास्टिक सर्जन डॉ. प्रणय सिंह चिकोटिया, डॉ. विकास कुमार शामिल रहे. यह रिसर्स नेशनल लाइब्रेरी आफ मेडिसिन (पबमेड) में प्रकाशित हुई है.
कोविड से हो गई अस्थाई डायबिटीज
मेडिसिन विभाग के प्रोफेसर डॉ. प्रभात अग्रवाल ने बताया कि कुछ मरीजों में कोविड के बाद नई डायबिटीज का पता चला. ब्लैक फंगस होने के बाद उनकी जांच की गई. इससे पहले उन्हें शुगर नहीं थी. यानि कहें तो कोविड से ट्रांसिएंट डायबिटीज संभव है. इस तरह के मरीजों को एक साल तक दवाइयां दी गई. इसके बाद उन्हें दवाइयों की जरूरत नहीं रह गई. अस्थाई डायबिटीज खत्म हो गई, जांच में कोई लक्षण नहीं मिले.
19.5 को हाईबीपी, 8.2% को हृदय रोग
ईएनटी विशेषज्ञ डॉ. अखिल प्रताप सिंह ने बताया कि ब्लैक फंगस वाले मरीजों में अन्य गंभीर रोगों की जांच भी की गई. पता चला कि इनमें से 19.5 फीसदी मरीज हायपरटेंशन (हाई ब्लड प्रैशर) से पीड़ित थे. इसी तरह 8.2 फीसदी हृदय रोग के मरीज पाए गए. जबकि, क्रोनिक किडनी डिजीज (सीकेडी) वाले मरीजों का प्रतिशत 3.09 रहा. सभी मरीजों को यह बीमारियां डायबिटीज के साथ पहले से पाई गईं.
ब्लैक फंगस 57.7 फीसदी मरीज पूरी तरह ठीक
एक साल के बाद मरीजों की स्थिति का आकलन किया गया. इलाज के बाद 57.7 फीसदी मरीज पूरी तरह ठीक हो गए. जबकि 30.9 फीसदी मरीजों को जान से हाथ धोना पड़ा. 11.3 फीसदी मरीज फालोअप में नहीं मिले.
